एक किसान को बहुत दिनों पश्चात संतान हुई, उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। नाम रखा 'देवदत्त'
पुत्र क्रमशः बढ़ने लगा, परंतु देवदत्त के दादा उसे अपने प्राणों से भी अधिक चाहते थे। तो पोता देवदत्त भी अपने दादा पर जान छिड़कता था। वह दादा का हर प्रकार से ध्यान रखता था।
देवदत्त की मां इस बात से ईर्ष्या करने लगी, और अंततः एक दिन नाराज होकर देवदत्त के पिता से बोली -इस घर में रहो तुम और तुम्हारा बाप, तथा बेटा। मैं तो कल सवेरे अपने पीहर चली जाऊंगी।
लेकिन किस लिए? पति ने पूछा।
जिसको श्मसान जाना चाहिए, वह वहां नहीं जाता और व्यर्थ में मुझे उसकी बेगार करना पड़ती है, इतना ही नहीं, मेरे बेटे पर भी उसने जादू कर दिया है कि, वह किसी तरह बुड्ढे को छोड़ता ही नहीं! इसलिए जा रहे हैं।
पति ने कहा- अरे! तू तो एकदम पागल है। जो विधाता के हाथ की बात है, उसमें हम कैसे दखल दे सकते हैं? किसी की मृत्यु हमारी इच्छा से तो नहीं हो सकती ना?
हां हमारी इच्छा से हो सकती है,पत्नी ने कहा।
यह सुनकर पति चौक उठा। बोला कैसे?
जिस प्रकार कैकेई के कान भरने में मंथरा ने कोई कसर ना रखी थी, उसी प्रकार स्त्री ने भी अपने पति के मन में बूढ़े बाप के विरुद्ध विष भर दिया और कहा इससे छुटकारा पाना ही समस्या का हल है।
रात भर पति इस पर विचार करता रहा, और अंत में उसने निश्चय किया कि पत्नी को प्रसन्न करने के लिए उसकी इच्छा अनुसार काम किया जाए।
दूसरे दिन उसने पिता से कहा -खेत में एक नया कुआं खोदना है, इससे तुम भी वही चलो, कोई जरूरी बात हो तो बताते रहना।
स्नेही स्वभाव के पिता ने तुरंत हां कह दी, पर बाबा से कभी अलग ना होने वाले देवदत्त ने कहा -मैं भी खेत में चलूंगा।
बाप ने उसे हर तरह से समझाया, पर वह नहीं माना ।
अंत में पत्नी ने कहा ले जाओ इस नाशपीटे को भी साथ में।
बाप ने फावड़ा और कुदाल लिया, तो बेटे ने भी यह सब चीजें ले ली।
बाप ने पूछा, तू यह सब चीजें क्यों ले रहा है?
तो पुत्र ने कहा- आप जो ले रहे हो तो?
बाबा ने कहा, अच्छा है ले चल, खेत में इन चीजों से खेलते रहना और एक दिन बड़ा किसान बन जाना।
मां ने इशारा किया और बाप चुप हो गया।
बाप, बेटा और बाबा तीनों बैलगाड़ी में बैठकर खेत की ओर चले। वहां जाकर बाबा को तो एक जगह बैठा दिया गया और बाप औजारों के साथ एक पेड़ के पीछे चला गया। उसने सोचा कि पुत्र देवदत्त जब तक बाबा के साथ बातों में लगा रहेगा, तब तक मैं अपना काम पूरा कर लूंगा।
पर जैसे ही वह पेड़ के पीछे पहुंचा देवदत्त भी वहां जाकर खड़ा हो गया। देखा कि बाप एक गड्ढा खोद रहा है।
देवदत्त ने भी उससे थोड़ी दूरी पर पेड़ के नीचे गड्ढा खोदना शुरू कर दिया।
बाप ने पूछा, क्या कर रहा है पागल?
तुम गड्ढा खोदते हो इसलिए मैं भी गड्ढा खोद रहा हूं।
तुझे खबर है मैं किस लिए खोद रहा हूं?
नहीं मैं क्या जानू?
बाप मर जाए तो गड्ढे का काम उसके बेटे को करना पड़ता है, इसीलिए मैं यह गड्ढा खोद रहा हूं।
तुम्हारे बाप तो मेरे बाबा ही है ना?
हां बेटा!
और मेरे बाप तुम हो!
हां ठीक है।
पर आपके बाप अभी मरे कहां हैं?
यह तो ठीक है, पर आगे से व्यवस्था कर लेना अच्छा है।
"आपका ख्याल ठीक है, मनुष्य को आगे की बात सोच कर ही काम करना चाहिए। मैं भी आपका ही अनुसरण करता हूं पिताजी! जब आप का देहांत होगा, तो गाड़ने के लिए मुझे गड्ढा तो खोदना ही पड़ेगा ना, इसलिए पहले से ही तैयारी कर लेना अच्छा है!"
बेटा ने बाप को शब्दों से ऐसा उत्तर दिया, जिससे वह चोंक पड़ा। उसे कुछ समझ ना पड़ा, कि अब वह क्या करें!
उसने फावड़ा दूर फेंक दिया और कहा- चलो बेटा! अब घर चलें।
पिता और पुत्र को गाड़ी में बैठा कर देवदत्त का पिता फिर घर पहुंच गया।
जीते जागते बुड्ढे को फिर घर आया देखकर देवदत्त की मां लाल पीली हो गई।
पति ने उसको एकांत में ले गया और देवदत्त की बात उसे सुना दी।
सुनकर स्त्री की आंखों के आगे का पर्दा हट गया, उसने जान लिया कि जैसा हम दूसरे के साथ करेंगे, वैसा ही हमको भी भोगना पड़ेगा।
देवदत्त ने अपने माता-पिता को सत्य की शिक्षा देकर अनिष्ट के मार्ग में जाने से बचाया।
इसके पश्चात उसकी माता ने ससुर के प्रति कभी तिरस्कार का भाव प्रकट नहीं किया, और बराबर उसकी सेवा शुश्रूषा करती रही।
।। मनेन्दु पहारिया।।
13/10/2022