।।056।। बोधकथा। 🌺💐🏵 जीने की कला 🏵💐🌺


एक शाम मां ने, दिनभर की लंबी थकान एवं काम के बाद, जब भोजन बनाया,और उन्होंने पिताजी के सामने एक प्लेट सब्जी, तथा जली हुई रोटी परोसी। 

मुझे लग रहा था की जली हुई रोटी पर पिताजी कुछ कहेंगे, परंतु पापा ने उस रोटी को प्रेम से चुपचाप खा लिया। परंतु मैंने मां को पिताजी से उस जली रोटी के लिए सॉरी बोलते हुए जरूर सुना था। 


और मैं यह कभी नहीं भूल सकता, जो पिताजी ने माताजी को कहा था- "प्रिय मुझे जली हुई कड़क रोटी बहुत पसंद है।"


 देर रात को जब मैंने सोते समय पिताजी से पूछा- क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है?

 उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा- "बेटा! तुम्हारी मां ने आज दिन भर ढेर सारा काम किया और वह सचमुच बहुत थकी हुई थी। और वैसे भी एक जली हुई रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचा सकती,  परंतु कठोर, कटु, शब्द जरूर मन को बहुत ठेस पहुंचाते हैं।"


 "तुम्हें पता है बेटा! जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से, अपूर्ण लोगों से, कमियों से,दोषों से। मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूं, और शायद ही किसी काम में पूर्ण पारंगत। मैंने इतने सालों में सीखा है कि, एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करो। अनदेखी करो और पसंद करो,आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।"


  मित्रों! जिंदगी बहुत छोटी है, उसे हर सुबह दुःख, पछतावे, के साथ जागते हुए बर्बाद ना करें। जो लोग आपसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें प्यार करें,और जो नहीं करते उनके लिए सहानुभूति रखें, दया रखें। किसी ने क्या खूब कहा है -:


"मेरे पास वक्त नहीं है उन लोगों से नफरत करने का, जो मुझे पसंद नहीं करते, क्योंकि मैं व्यस्त हूं उन लोगों को प्यार करने में, जो मुझे पसंद करते हैं।"


 तो आप सभी लोग जिंदगी का आनंद लीजिए, उसकी समाप्ति, अंत, तो निश्चित है। अतः आप सब स्वस्थ रहें, सुखी और समृद्ध रहें, साथ ही अपने काम में व्यस्त रहें, मस्त रहें। 

सदैव प्रसन्न रहिए। जो प्राप्त है, पर्याप्त है। 


।। मनेन्दु पहारिया।। 

  03/10/2022

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