।।019।। बोध कथा। 🌺💐🏵 जीवनदान 🏵💐🌺


महाकवि माघ आज कंगाल हो गए। कल तक वे 36हजार मणियों वाले रत्न हार के स्वामी थे। पिता ने अपार संपत्ति उत्तराधिकार में दी थी। उन्हें पता था माघ की करुणा समुद्र की तरह अगाध है, वह दीन दुखियों के दुख नहीं देख सकता। वह अपनी संपूर्ण संपत्ति संपूर्ण योग्यताओं को राष्ट्र की संपत्ति मानता है। इसीलिए जो भी अभावग्रस्त उसके द्वार आता था, माघ उसे खाली हाथ नहीं जाने देता। 

श्रीमाल (माघ की जन्मभूमि) का अकाल इस सीमा तक बढ़ा कि लोगों के भूखों मरने की नौबत आ पहुंची। माघ की करुणा ने सीमा तोड़ दी, उसने अपनी संपूर्ण संपत्ति के साथ-साथ, पिता की वह माला भी राष्ट्र और भूख से पीड़ितों के लिए सहायतार्थ दान कर दी। 

जिस प्रकार गुण और सज्जनता से विमुख हुए के पास से, यस और समृद्धि भाग जाते हैं, वैभव क्षीण हो जाने पर, उसी प्रकार माघ के पास आने वाले याचकों का आवागमन भी बंद हो गया।

 अब माघ की सहधर्मिणी,और अंतःकरण में कर्तव्य पालन का संतोष, मुख पर आत्म भाव का प्रकाश,और वह महाकाव्य जिसमें माघ ने मानव जीवन के प्रेरक प्रसंगों को सजा रखा था, अभी उनके पास थे। 

माघ अभावग्रस्त स्थिति में चिंतित हो उठे। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से पूछा-भद्रे!  ऐसी स्थिति में क्या यह उचित नहीं होगा, कि हम लोग किसी अन्य स्थान पर चलें, जहां आजीविका का प्रबंध हो सके और अपनी रुकी हुई साधना का क्रम फिर चल पड़े। 

श्रीमाल के पीड़ितों का दर्द मुझे अब असहनीय हो रहा है। 

आप ठीक कहते हैं स्वामी! माघ की विदुषी पत्नी विद्यावती ने उत्तर दिया- "व्यक्ति को भगवान ने और नहीं, तो संपूर्ण क्षमताओं से परिपूर्ण शरीर दिया है। जब तक शरीर है तब तक हम साधनों का अभाव क्यों अनुभव करें।"

 माघ और उनकी धर्मपत्नी चल पड़े। 

उन दिनों उज्जैन के महाराज भोज भारतीय कला और संस्कृति के उत्थान के लिए प्राण पण से जुटे हुए थे। सरस्वती पुत्र भोज के राज दरबार में पंडितों को बड़ा सम्मान दिया जाता था। 

पैदल यात्रा करते हुए माघ, पत्नी सहित मालव पहुंचे।  उन्होंने अपनी पत्नी विद्यावती को भोज के दरबार में भेजा। 

महाकाव्य साथ में लेकर विद्यावती सम्राट भोज के समक्ष उपस्थित हुई और उस पुस्तक को गिरवी रखने का निवेदन किया। 

भोज ने महाकाव्य उठाया। यूं ही देखने के लिए उन्होंने एक प्रष्ठ खोला। "एक बहुत भाव पूर्ण श्लोक सामने आया, जिसमें प्रकृति और परमेश्वर की विलक्षणता बड़े मार्मिक शब्दों में प्रतिपादित की गई थी।"

 भोज उसे देखकर अति प्रसन्न और प्रभावित हुए। कोषाध्यक्ष को 100000 स्वर्ण मुद्राएं पारितोषिक देने का आदेश देकर उन्होंने महाकाव्य अपने पास रख लिया। 

विद्यावती जब अतिथि गृह छोड़कर निकली तो देखा, वहां पर भी अकाल की छाया घिरी हुई है। हजारों याचक थे। पति के आदर्शों का अंतः करण से पालन करने वाली माघ की धर्मपत्नी का ह्रदय, उस समय इस तरह विकल हो उठा, जिस तरह किसी मां का हृदय अपने बहुत दिन के बिछड़े हुए पुत्र को देखकर हो उठता है। उनके मस्तिष्क में आया "जब सारी प्रजा दुख और पीड़ा से ग्रस्त हो,तो साधनों का, चाहे कितने ही परिश्रम से कमाए गए हो, संग्रह नहीं होना चाहिए।"

 निदान, उन्होंने वह धन बांटना प्रारंभ कर दिया। मार्ग में जो भी भूखा मिला, उसे आवश्यकता की हर वस्तु दिलवाई।

 इस प्रकार विद्यावती जब माघ के पास पहुंची, तब तक प्राप्त की हुई संपूर्ण स्वर्ण मुद्राएं समाप्त हो चुकी थी। विद्यावती जब गई थी, तो उनके पास महाकाव्य था, पर लौटी तो हाथ बिल्कुल खाली।

 महाकवि माघ ने विद्यावती से सारा वृत्तांत सुना, तो उनका हृदय पत्नी के आदर्श पर गदगद हो उठा। उनकी आंखों से प्रेमाश्रु बह निकले। 

अभी वे इस असमंजस में थे, कि विद्यावती का स्वागत और सम्मान किस प्रकार करें, तभी याचको की एक नई टोली वहां पहुंची। माघ ने अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कुछ दिखाई ना दिया, तो उनकी आंखें गीली हो गईं आंसू झरने लगे। 

महाकवि माघ की यह मुद्रा देखकर भिक्षुक समझ गए, अब इनके पास कुछ नहीं रहा। सो वे भी चुपचाप लौट पड़े। 

याचिकों के लौटते ही माघ की करुणा सरिता बह कर फूट निकली।

 "माघ के मुख से करूणापूर्ण वांणी फूटी,मेरे प्राणों! देख रहे हो! याचक द्वार से खाली हाथ लौट रहे हैं! तुम और कुछ नहीं दे सकते, पर इनकी सहायतार्थ इनके साथ तो जा सकते हो। धन से ना सही संभव है प्राणों से ही उनकी सेवा करने का सौभाग्य मिल जाए, ऐसा सुंदर अवसर फिर कब मिलेगा।"

और इन अंतिम शब्दों के साथ ही महाकवि की जीर्ण काया एक और लुढ़क गई। चेतना ने अपने पैर समेट लिए और अनंत अंतरिक्ष में न जाने कहां विलीन हो गई।

 ऐसे थे महादानी, महाकवि, माघ और उनकी विदुषी पत्नी, विद्यावती। 

।। मनेन्दु पहारिया।।

 02/09/2022

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