।।001।। बोधकथा। शून्य नगर से भविष्य नगर की यात्रा



।।001।। बोध कथा।।

🌺शून्य नगर से भविष्य नगर की यात्रा🌺

 महर्षि जातवेद ने पाठ प्रारंभ किया और बोले- शिष्यो! आज मैं तुम्हें योग वशिष्ठ का एक उपाख्यान सुनाता हूं। 
शून्यनगर, उसमें तीन राजपुत्र रहते थे, जिनमें दो तो पैदा ही नहीं हुए थे! एक गर्भ में नहीं आया था। 
तीनों ने मिलकर निश्चय किया कि कहीं बाहर जाकर धन उपार्जन करना चाहिए। यह सोच कर वह चल पड़े। 
भूख प्यास से थक कर तीनों, तीन वृक्षों की छाया में बैठ गए। इन तीन वृक्षों में, दो तो उगे ही नहीं थे और एक का बीजारोपण भी नहीं हुआ था। वृक्षों के नीचे बैठकर तीनों ने विश्राम किया और मीठे फल खाए। 

तत्पश्चात आगे बढ़ने पर उन्हें तीन नदियां मिली। दो नदियां तो जल से रहित थीं, और एक सूख गई थी। तीनों ने ठंडे जल से स्नान किया और प्यास बुझाई। 
आगे बढ़े तो सांझ हो गई। सामने एक भविष्य नगर दिखाई पड़ा। नगर में प्रवेश करने पर तीन भवन मिले। जिनमें दो बने ही नहीं थे और तीसरे में ईट भी नहीं रखी गई थी। 
तीनों ने मिलकर तीन ब्राह्मणों को निमंत्रण दिया। ब्राह्मणों में दो अशरीरी थे और तीसरे का मुँह नहीं था। 
तीनों ने थालियों में भोजन किया। दो थालिया, तली रहित थीं, तथा तीसरे का स्थूल रूप ही नहीं था। 
भविष्य नगर में तीनों राजपुत्र सुख पूर्वक जीवन यापन करने लगे।

 उपाख्यान समाप्त हुआ, तो स्नातक महर्षि के मुख की ओर ताक रहे थे। इस विलक्षण उपाख्यान ने उनकी जिज्ञासा तो जगा दी किंतु समाधान किसी के लिए भी संभव न था। सो उन्होंने समवेत प्रश्न किया- गुरुदेव! तीनों राजकुमार, तीन वृक्ष, तीन नदियां, तीन मकान, तीन ब्राह्मण, और तीन थालियों का रहस्य हमें भी बताएं! ताकि हम भी अपने भविष्य नगर में सुख पूर्वक रह सके। 

महर्षि गंभीर होकर बोले- शिष्यो! "तीन राजकुमार- जीव,आत्मा,और ब्रह्म हैं। प्रथम दो यद्यपि अविनाशी हैं, किंतु शरीर के साथ गर्भ में आना पड़ता है। पर ब्रह्म जिस के अंश से ही वे दो सत्य है, गर्भ में ना आते हुए भी अस्तित्व में बना रहता है।"

उनका वृक्ष की छाया में पहुंचना अर्थात- "सांसारिक फल, वासना, तृष्णा, और अहंकार मैं सुख मानने की प्रवृत्ति है। इनमें वासना और तृष्णा का तो कोई स्वरूप है भी, किंतु अहंकार का तो कोई अस्तित्व ही नहीं,फिर भी वही सारे उपद्रवों की जड़ है।"

 "तीन नदियां जीवन के तीन प्रवाह हैं। बाल्यावस्था, यौवन, और वृद्धावस्था।
प्रारंभिक दो में जल ही नहीं होता, अर्थात -होश ही नहीं आता। किंतु जीवन के तीसरे प्रहर में, जब तक होश आए, सारी शक्ति समाप्त हो चुकी होती है। तब कहीं स्मरण आता है कि भविष्य, अर्थात लोकोत्तर जीवन की। "

 "और तीन भवन -तीन आश्रय, अर्थात- सत्य, संतोष, और श्रद्धा की शरण होना पड़ता है। 
सत्य और संतोष अभिव्यक्त हैं, किंतु श्रद्धा अभ्यांतर है।" 
"ज्ञान, कर्म,और भक्ति के तीन ब्राम्हण से परिचित होना, मनुष्य के कल्याण की भूमिका प्रस्तुत होना है। ज्ञान और कर्म योगी साधनाएं तो साधन जन्य होती हैं, पर भक्ति उससे सर्वथा मुक्त। उनको भोजन कराना अर्थात- आत्मनिरीक्षण, आत्म शोधन, और आत्म निर्माण की प्रवृत्ति का विकास ही वह अवलंबन है, जिससे आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्म प्राप्ति की साधना सिद्ध हो पाती है।
 अर्थात इन विनाशशील जगत के प्रपंच से छूटकर मनुष्य सत्य को प्राप्त और धारण करता है।"
 स्नातक संतुष्ट हुए ।

।।मनेन्दु पहरिया।।
   19/08/2922

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